शुक्रवार, 7 अक्तूबर 2011

कई बार नहीं , ज्यादातर ....

कई बार नहीं , ज्यादातर ....
हम अपनी सोच से दूसरे की सोच तय कर
एक निर्णयात्मक मुहर लगा देते हैं
फिर सामनेवाले का कोई व्यवहार
उस मुहर से टस से मस नहीं होता ....!!!

- रश्मि प्रभा


4 टिप्‍पणियां:

  1. कितना सही है ना . यदि हर इंसान उक्त परिस्थितियों में खुद को रखकर देखे तो उस समय उस व्यक्ति की मनोस्थिति को समझ सकता है , मगर लोंग ऐसी कोई कोशिश नहीं करते , वे अपनी ही नजर से अपने नज़ारे देखते हैं , समझते हैं !

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  2. बहुत बढ़िया प्रस्तुति ||

    बहुत बहुत बधाई ||

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  3. sach me itne acche vichar hai apke..
    mai jab bhi apke vichar padhati hu to aisa lagta hai ki aaj jindagi ka ek nayaa sabak sikha bina kuch kimat chukaye..
    dhanywad

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