गुरुवार, 7 अप्रैल 2011

देने में कंजूसी .....

हर व्यक्ति प्रशंसा के शब्द पाना चाहता है
पर देने में कंजूसी ..... !!

- रश्मि प्रभा

9 टिप्‍पणियां:

  1. हर व्यक्ति कही ना कही कुंठित होता है जब मन में कुंठा होतो ना प्रंसंशा होगी ना तारीफ़ ! मगर अपवाद भी होते है !

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  2. mai apvad me hun ...mai har log ka prasnsha karna chahti hun pr bolu kya ye samjh me nahi aata hai ...isiliye chup rah jati hun ...kyoki mere sath kuchh aisa hota hai ki agar mere samne koi meri prasansha kar raha ho to mujhe aisa lagata ki kab ye lamha sampt ho jaye ..ya mai kahi chhup jau jo mujhe koi nahi dekhe ....kintu prsnsha karni chahiye mujhe nahi pasand to kya jo achha hai usaki parsnsha to honi hi chahiye !!!

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  3. हम्म ज्यादातर तो यही होता है ..कई बार ज्यादा प्रसंशा पाकर इंसान घमंड से फूल भी जाता है.

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  4. संतुलित प्रशंसा करने में हर्ज़ ही क्या है ...
    सत्य वचन !

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  5. पर दीदी, यदि हिंदी ब्लॉग जगत में टिप्पणिओं को देखा जाय तो शायद ऐसा नहीं है ... यहाँ तो प्रशंसा ही प्रशंसा है ...

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  6. प्रशंसा से बदले प्रशंसा ही मिले ...ये आवश्य तो नहीं है

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यह प्रेरक विचार आपके प्रोत्‍साहन से एक नये विचार को जन्‍म देगा ..
आपके आगमन का आभार ...सदा द्वारा ...