शुक्रवार, 3 अगस्त 2012

चिंतन ...

जिन्‍दगी छल है 
प्रकृति निश्‍छल 
हम छल से भी लेते हैं और सीखते हैं, 
निश्‍छल से भी लेते हैं और सीखते हैं .. 
फिर हम प्रयोगवादी आदर्शवादी बन जाते हैं 
हम लेते हुए काट-छांट करने लगते हैं 
छल से देना स्‍वीकार नहीं होता 
कृत्रिम निश्‍छलता से बस अपने फायदे का लेखा-जोखा करते हैं 
और समाज सुधारक - विचारक बन जाते हैं   !

- रश्मि प्रभा

4 टिप्‍पणियां:

  1. कृत्रिम निश्‍छलता से बस अपने फायदे का लेखा-जोखा करते हैं
    और समाज सुधारक - विचारक बन जाते हैं !
    सच में कई बार समझना मुश्किल होता है और अपनी बुद्धि पर भ्रम होने लगता है !

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  2. निश्छल मन की तुलना किसी से नहीं हो सकती |कृत्रिमता का मुखौटा बहुत जल्दी उतर जाता है |
    आशा

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आपके आगमन का आभार ...सदा द्वारा ...