सोमवार, 1 अगस्त 2011

अमृत को ....

साँपों के बीच जो रहने लगते हैं
वे उनके विष को ही भोजन बना लेते हैं
और अमृत को पचाने में असक्षम हो जाते हैं ........!!

- रश्मि प्रभा





9 टिप्‍पणियां:

  1. कुछ लोग ऐसे भी होते
    सापों के बीच रहते
    ना जहर पीते
    ना ज़हर उगलते
    खुद को बचा कर रखते
    ज़हर को मिठास से मारते
    निरंतर
    मोहब्बत का पैगाम देते
    ज़िन्दगी खुशी से जीते

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  2. वाह!! सटीक निर्देशन!! अभूतपूर्व!!

    "रहने लगते हैं" में गहन भाव है। अर्थात् सांपो की जीवन-शैली अपना लेते है।
    उनके विष को ही भोजन बना लेते हैं (क्रोध को सहज बना लेते है।)
    और अमृत को पचाने में असक्षम हो जाते हैं (क्षमा प्रदान कर शान्ति प्राप्त करने में अक्षम हो जाते है)

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  3. हमने तो ऐसे भी विषपायी देखे हैं
    जो ज़हर को अपने में समेटे
    जीवन भर नीलकंठ बने रहे
    और अन्य सभी
    अपने हिस्से का ज़हर भी
    उन्हें पिला कर खुद
    सोमरस का स्वाद
    चखते रहे !
    शायद दुनिया की यही रीत है !

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  4. विष को अमृत में बदलने का हौसला लिए भी आखिर निराश हो जाते हैं , दूसरों का उगला विष भी आखिर कब तक हज़म किया जा सकता है !

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  5. बिल्कुल सत्य बात.....आज के परिपेक्ष्य में।

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  6. आज की स्थिति यही है, विष को अपनाकर लोग अमृत को पचाने में असमर्थ से हो गए हैं... विष के आदी हो गए हैं... गूढ़ चिंतन....

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  7. जी बिल्कुल सच..

    मुझे लगता है कि अब ये बात कहना बेमानी है कि

    "चंदन बिष व्यापत नहीं लपटे रहत भुजंग"

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  8. बिलकुल सही कहा आपने /सार्थक विचार /बधाई आपको

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यह प्रेरक विचार आपके प्रोत्‍साहन से एक नये विचार को जन्‍म देगा ..
आपके आगमन का आभार ...सदा द्वारा ...