सोमवार, 27 जून 2011

कर्तव्‍य निभाना ....

असहज भाव से कर्तव्य निभाना
रिश्तों को बोझ बनाना होता है ....

- रश्मि प्रभा

3 टिप्‍पणियां:

  1. सटीक ..और यह बोझ ज्यादा दिन नहीं उठाया जा सकता

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  2. आपके ही सौजन्य से --

    इक पहाड़ सा लगने लगता उन रिश्तों का बोझ |

    धीर-धीरे रहे बिगड़ते, रहे नहीं जब *सोझ || *सरल



    जिसकी बुद्धि जितनी पैनी, उस पर ही यह भार |

    करे जरुरी चिंतन दिल से, सारे बोझ उतार ||

    असहज भावों पर रविकर, वो करें नियंत्रण जमके |

    फिर से रिश्ते सहज बनेंगे, लगा लेप मरहम के ||


    रिश्तों की पूंजी बड़ी , हर-पल संयम *वर्त | *व्यवहार कर
    पूर्ण-वृत्त पेटक रहे , असली सुख *संवर्त || *इकठ्ठा

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  3. एक दम सही, ऐसे कर्तव्य निष्फल श्रम ही सिद्ध होते है।

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यह प्रेरक विचार आपके प्रोत्‍साहन से एक नये विचार को जन्‍म देगा ..
आपके आगमन का आभार ...सदा द्वारा ...