शुक्रवार, 4 फ़रवरी 2011

प्यार समर्पण .... ईश्वरीय गुण हैं ...

प्यार समर्पण .... ईश्वरीय गुण हैं ...

सब को इनका आशीर्वाद नहीं . अन्दर से जब हम

खाली होते हैं तभी हमारी पात्रता निर्मित होती है

और ईश्वर हमारे अन्दर इसे भरते जाते हैं ....

अवगुण सहज आते हैं पर दैविक आग पर चलकर

अपना अस्तित्व भूलने पर हम देव वाणी बन जाते हैं ...।

- सुमन सिन्हा

4 टिप्‍पणियां:

  1. प्यार और समर्पण हर रिश्तों का जौहरी है, जितनी गहराई ... चमक उतनी ही अदभुत होती है और ईश्वर समर्पण में ही मिलते हैं ! छल-प्रपंच की काई पर प्यार नहीं ठहरता ... फिर समर्पण का प्रश्न कहाँ ... मांगने से पूर्व खुद को खाली रखो , ईश्वर तो हर क्षण उद्दत है देने को !

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  2. प्‍यार वह धन है जो खर्च करने पर दुगना लौटकर आता है। जितना उसे बचाकर रखेंगे उतना ही वह कम होता जाएगा।

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  3. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    प्यार और समर्पण वो धन है जिसके आगे कुबेर का ख़ज़ाना भी छोटा है !

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  4. "छल-प्रपंच की काई पर प्यार नहीं ठहरता" Very true...
    "अवगुण सहज आते हैं पर दैविक आग पर चलकर,अपना अस्तित्व भूलने पर हम देव वाणी बन जाते हैं ... Bahut khub Suman Uncle...!

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