शुक्रवार, 10 फ़रवरी 2012

कुँए में पनपती सोच .....

कुँए को नियति बना जो दुनियादारी दिखाते हैं , वे किसी को नहीं समझते 
क्योंकि उनकी सोच कुँए तक ही होती है 
पर जो कुँए से बाहर निकल गहरी सांस लेते हैं 
उनको पता होता है कुँए में पनपती सोच कैसी होती है !
 
- रश्मि प्रभा 

6 टिप्‍पणियां:

  1. वो जो कुँएं के भीतर हो सोचते हैं उनको कूपमंडूक की श्रेणी में रखा जाता है :)

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  2. और क्या...
    अपनी टर्र.. टर्र.. को ही सर्वोपरि समझते हैं..
    :-)

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  3. kuaa kaho yaa patlee nalee ,log sirf wo dekhte hein jo dekhnaa chaahte hein
    yathaarth se door bhaagte hein,zindgee ko bade canvass par dekhne kee aavashyaktaa hai.Badhiyaa soch rasjmiji

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  4. jine ke liye ab unhe bhi apni soch bdlni pdegi aur kafi log bdl bhi rhe hain.

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  5. बहुत ही सटीक एवं सच्ची बात कही है आपने......आपके विचार से मेरी सहमति,...
    कृपया इसे भी पढ़े-
    नेता- कुत्ता और वेश्या (भाग-2)

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यह प्रेरक विचार आपके प्रोत्‍साहन से एक नये विचार को जन्‍म देगा ..
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